Monday, 26 October 2020 0 टिप्पणी करें-

ऐ गरीबी ! तेरा कोई हल तो होगा ही.......

ऐ गरीबी ! तेरा कोई हल तो होगा ही,

मुझे यकीन है

आज नहीं तो कल तो होगा ही ।

तू खून - ए - पसीना करता जा

परिवर्तन पल - पल तो होगा ही,

ऐ गरीबी ! तेरा कोई हल तो होगा ही ......


हिम द्रवित तो जल होगा ही 

सरिता प्रवहित तो कल - कल होगा ही ।

ऐ परिंदे ! तू दीदार - ए - गगन करता जा,

मुझे है यकीन,

तू लक्ष्य भेदने में सफल तो होगा ही,

ऐ गरीबी ! तेरा कोई हल तो होगा ही ......


कच्ची ये ईंटे है और कच्ची ही दीवार है,

डरकर जो तू बैठ गया,

तेरे बृद्ध पिता की हार है । 

राह - ए - अंगार पर तू चलते जाना,

तेरा भी अपना एक महल तो होगा ही । 

ऐ गरीबी ! तेरा कोई हल तो होगा ही ......


© dECOdER

Sunday, 18 May 2014

"मालवीया में अंतिम क्षण"


मालवीया में अंतिम क्षणों के दुख की अभिव्यक्ति इस कविता के माध्यम से हुई है ।
शब्द ही नहीं है , कैसे बयाँ करुँ 
पिछली दो रातें मैंने कैसे काटा ?
हवा ने रुख बदला ही है 
फिजा में भी छाया है सन्नाटा ॥ 

घडी की टिक टिक सुइयां 
कहती हैं , पक्षी तू बसेरा छोड़ दे । 
वक्त हो चला है, उड़ जा 
और जीवन को नया मोड़ दे ॥ 

काल का है चक्र 
लगता उड़ना ही पड़ेगा । 
पुरानी गालियाँ छोड़ के 
नए मोड़ मुड़ना ही पड़ेगा ॥ 

इन गलियों ने इक मर्म को 
भरा है मेरे सीने में । 
मर्म जो सिद्ध होगा अमिय 
वास्तविकता से जीवन जीने में ॥ 

कैसे अदा करूँ यह कर्ज 
जो मैंने है आप से लिया । 
झुकता हूँ चरणो में आपके 
वन्दन है हे ! मदन मोहन मालवीया ॥ 
Sunday, 28 July 2013

"वार्डन चौरसिया जी"


चौरसिया जी सुभाष भवन के नए वार्डन है और इस कविता का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना है ।
डरने लगा है जिया,
जब से पता चला है। 
बन गए है,
सुभाष के नए वार्डन चौरसिया॥ 

मेस की हालत है सुधरी,
पहले आलम यह था। 
जहां बैठे खिलाने वाले,
रोटी जाए उधरी॥ 

पहली ब्रीफिंग का प्रभाव था, 
हॉस्टल में बच्चों का अभाव था। 
सब को यह बात पता थी, 
'कह के लेना' ही चौरसिया का स्वाभाव था॥ 

जर्जर स्थिति थी कॉमन रूम की,
चौरसिया ने देखा और ज़ूम की। 
सख्त हिदायत सुधर जाओ,
हालत फिर बिगड़ी प्यून की॥ 

एक तथ्य नया है,
किसने क्या खाया और 
किसने है क्या पीया ?
देखकर ही पता कर लेते है,
सुभाष के नए वार्डन चौरसिया॥ 

क्रमशः .....

Thursday, 20 June 2013

"प्रकृति का प्रकोप"


प्रस्तुत कविता जून (२०१३ ) माह में उत्तराखंड में आये प्रकृति के प्रकोप एवं देश की राजनीतिक परिस्थितियों के साथ - साथ सेना के अविस्मरनीय योगदान को प्रदर्शित करती है ।


प्रकृति का प्रकोप है जारी,
आहत है सभी ,पशु -पक्षी ,नर और नारी।
विडंबना है! हमारे देश की,
जहाँ राजनीति  है सब पर भारी ॥

नेता जी कहते 'प्रकृति प्रकोप'
कौन पायेगा इसको रोक।
मै कहता हूँ 'मानवता' ,एकजुट हो जा,
वक्त नहीं करने का शोक॥

एक सलाम सेना के नाम,
किया है जिसने ऐसा काम ।
मार स्वयं को जिसने ,
दिया डाल मुर्दों में जान॥ 
Wednesday, 18 January 2012

" साल दो हजार दस"


यह कविता उस दृश्य का बखान करती है जब मैंने २०१० में बी . टेक प्रथम वर्ष में मदन मोहन मालविया इंजीनियरिंग कॉलेज ,गोरखपुर में प्रवेश लिया था ।
यह था साल दो हजार दस, घमंड था स्वयं को,कहने का । हे दुनिया!मुझ पर न हस, क्योंकि मुझ में भी है वह शक्ति। जिससे लोग पाते हैं यश और कीर्ति ॥ फिर आया महीना जुलाई, मुझे क्या पता,मेरी भी सामत आयी । दाखिला मिला एम.एम.एम.इन्जी.कॉलेज मे, खुश था,सोंचा इजाफा होगा नॉलेज में ॥ कॉलेज के पहले ही दिन, मैनें देखा कई तोता और मैना । और जैसे ही क्लास में घुसा, बस सुनाई दे रहा था,के.पी.सिंह का "हैना-हैना" ।। फिर कुछ ही दिनों में, कई सहपाठियों ने किए,अपनें-अपनें चार नैना । ऐसी परिस्थितियों में, मुझे नहीं लगा ठीक,रिस्क लेना । और आ गया था वक्त, जब सभी को फर्स्ट सेसनल भी था देना । हो रही थी ब्रीफिंग पर ब्रीफिंग, और सीनियर्स कहते थे "एटलीस्ट पार्टिसपेट तो कर लेना" ॥ धीरे-धीरे यूँ ही,प्रथम वर्ष गुजरा । मन में थी खुशी, आने दो जूनियर्स को,एक-एक से करायेंगे मुजरा ॥ ऐसे कुछ बीता वर्ष प्रथम, मन मे हर्ष भी था,लेकिन ज्यादा था गम ॥ क्रमशः .....
 
© All rights reserved.Mohit Kumar Patel Blog