Thursday, 20 June 2013

"प्रकृति का प्रकोप"


प्रस्तुत कविता जून (२०१३ ) माह में उत्तराखंड में आये प्रकृति के प्रकोप एवं देश की राजनीतिक परिस्थितियों के साथ - साथ सेना के अविस्मरनीय योगदान को प्रदर्शित करती है ।


प्रकृति का प्रकोप है जारी,
आहत है सभी ,पशु -पक्षी ,नर और नारी।
विडंबना है! हमारे देश की,
जहाँ राजनीति  है सब पर भारी ॥

नेता जी कहते 'प्रकृति प्रकोप'
कौन पायेगा इसको रोक।
मै कहता हूँ 'मानवता' ,एकजुट हो जा,
वक्त नहीं करने का शोक॥

एक सलाम सेना के नाम,
किया है जिसने ऐसा काम ।
मार स्वयं को जिसने ,
दिया डाल मुर्दों में जान॥ 
 
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