यह था साल दो हजार दस, घमंड था स्वयं को,कहने का । हे दुनिया!मुझ पर न हस, क्योंकि मुझ में भी है वह शक्ति। जिससे लोग पाते हैं यश और कीर्ति ॥ फिर आया महीना जुलाई, मुझे क्या पता,मेरी भी सामत आयी । दाखिला मिला एम.एम.एम.इन्जी.कॉलेज मे, खुश था,सोंचा इजाफा होगा नॉलेज में ॥ कॉलेज के पहले ही दिन, मैनें देखा कई तोता और मैना । और जैसे ही क्लास में घुसा, बस सुनाई दे रहा था,के.पी.सिंह का "हैना-हैना" ।। फिर कुछ ही दिनों में, कई सहपाठियों ने किए,अपनें-अपनें चार नैना । ऐसी परिस्थितियों में, मुझे नहीं लगा ठीक,रिस्क लेना । और आ गया था वक्त, जब सभी को फर्स्ट सेसनल भी था देना । हो रही थी ब्रीफिंग पर ब्रीफिंग, और सीनियर्स कहते थे "एटलीस्ट पार्टिसपेट तो कर लेना" ॥ धीरे-धीरे यूँ ही,प्रथम वर्ष गुजरा । मन में थी खुशी, आने दो जूनियर्स को,एक-एक से करायेंगे मुजरा ॥ ऐसे कुछ बीता वर्ष प्रथम, मन मे हर्ष भी था,लेकिन ज्यादा था गम ॥ क्रमशः .....
Wednesday, 18 January 2012
" साल दो हजार दस"
By :
Mohit Kumar Patel