Sunday, 18 May 2014

"मालवीया में अंतिम क्षण"


मालवीया में अंतिम क्षणों के दुख की अभिव्यक्ति इस कविता के माध्यम से हुई है ।
शब्द ही नहीं है , कैसे बयाँ करुँ 
पिछली दो रातें मैंने कैसे काटा ?
हवा ने रुख बदला ही है 
फिजा में भी छाया है सन्नाटा ॥ 

घडी की टिक टिक सुइयां 
कहती हैं , पक्षी तू बसेरा छोड़ दे । 
वक्त हो चला है, उड़ जा 
और जीवन को नया मोड़ दे ॥ 

काल का है चक्र 
लगता उड़ना ही पड़ेगा । 
पुरानी गालियाँ छोड़ के 
नए मोड़ मुड़ना ही पड़ेगा ॥ 

इन गलियों ने इक मर्म को 
भरा है मेरे सीने में । 
मर्म जो सिद्ध होगा अमिय 
वास्तविकता से जीवन जीने में ॥ 

कैसे अदा करूँ यह कर्ज 
जो मैंने है आप से लिया । 
झुकता हूँ चरणो में आपके 
वन्दन है हे ! मदन मोहन मालवीया ॥ 
 
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