शब्द ही नहीं है , कैसे बयाँ करुँ पिछली दो रातें मैंने कैसे काटा ? हवा ने रुख बदला ही है फिजा में भी छाया है सन्नाटा ॥ घडी की टिक टिक सुइयां कहती हैं , पक्षी तू बसेरा छोड़ दे । वक्त हो चला है, उड़ जा और जीवन को नया मोड़ दे ॥ काल का है चक्र लगता उड़ना ही पड़ेगा । पुरानी गालियाँ छोड़ के नए मोड़ मुड़ना ही पड़ेगा ॥ इन गलियों ने इक मर्म को भरा है मेरे सीने में । मर्म जो सिद्ध होगा अमिय वास्तविकता से जीवन जीने में ॥ कैसे अदा करूँ यह कर्ज जो मैंने है आप से लिया । झुकता हूँ चरणो में आपके वन्दन है हे ! मदन मोहन मालवीया ॥
Sunday, 18 May 2014
"मालवीया में अंतिम क्षण"
By :
Mohit Kumar Patel